उस कैनवास पर उकेरना चाहता हूँ इस लेखनी से
भर देना चाहता हूँ रंगों से इसे
लिखना चाहता हूँ स्वर्ण अक्षरों से
इस चाहत को उड़ेलने की ध्वनि गूँज रही जोरों से मुझमें
कैनवास के इस फटी सी कोनों को सिलना चाहता हूँ
इस बेजान में जान डालने की कोशिश अनंत दिनों से कर रहा हूँ
सहसा रुक जाता है यह लहर
ठहर कर पूछता हूँ आखिर क्या वो ही है
इस हिचकौले खाते हुए लहर पूछती है अंजान से
तू सहसा रुक क्यों गया
उठ खड़ा हो पूछ लो इस राही से
गुजरते हुए चंद दिनों से अनुभूतियाँ तो बहूत हुई होंगी तुझे
करने को जो चला तू पूरा कर उसे
रुककर बढ़ना ही तो साहस है
तेरे इसी हड़बड़ाहट ने उस फटे को थोड़ा और खींचा है
रुक पूछ खुद से उसे सिलने की ताकत बाकी हो तुझमें