Saturday, April 27, 2019

Chahat

उस कैनवास पर उकेरना चाहता हूँ इस लेखनी से 
भर देना चाहता हूँ रंगों से इसे 
लिखना चाहता हूँ स्वर्ण अक्षरों से 
इस चाहत को उड़ेलने की ध्वनि गूँज रही जोरों से मुझमें

कैनवास के इस फटी सी कोनों को सिलना चाहता हूँ
इस बेजान में जान डालने की कोशिश अनंत दिनों से कर रहा हूँ
सहसा रुक जाता है यह लहर
ठहर कर पूछता हूँ आखिर क्या वो ही है

इस हिचकौले खाते हुए लहर पूछती है अंजान से 
तू सहसा रुक क्यों गया 
उठ खड़ा हो पूछ लो इस राही से 
गुजरते हुए चंद दिनों से अनुभूतियाँ तो बहूत हुई होंगी तुझे

करने को जो चला तू पूरा कर उसे 
रुककर बढ़ना ही तो साहस है 
तेरे इसी हड़बड़ाहट ने उस फटे को थोड़ा और खींचा है 
रुक पूछ खुद से उसे सिलने की ताकत बाकी हो तुझमें

Thursday, May 17, 2018

अदृश्य लहर

अंतहीन लहरे मानो कह रही हैं
छू कर ऩ जाओ मुझे
इतनी साहस है तो डूबकर गुज़र जाते
अपना कर देखो
इस अनजाने राह पर एक अजीब सी झुरमुट हैं


Chahat

उस कैनवास पर उकेरना चाहता हूँ इस लेखनी से  भर देना चाहता हूँ रंगों से इसे  लिखना चाहता हूँ स्वर्ण अक्षरों से  इस चाहत को उड़ेलने की ध्व...